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कॉपरनिकस की क्रांति

सबसे पहले मैं आप सभी को धन्यवाद कहना चाहता हूं आपने मेरे ब्लॉग को पढ़ा और कई लोगों के मुझे ईमेल भी मिले इनमें कई विद्यार्थियों ने मुझे कहा कि मैं अपने Astronomy के ब्लॉग हिंदी में लिखूं| तो लीजिए उन सभी के लिए मेरी तरफ से एक दिलचस्प व मजेदार टॉपिक, आज हम बात करेंगे "कॉपरनिकस की क्रांति के बारे में"

जैसा कि आप सभी को भी दें कॉपरनिकस एक महान वैज्ञानिक थे| उन्होंने हमारे ब्रह्मांड के बारे में हमें बहुत कुछ बताया है कोपरनिकस के मॉडल में सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित था| बुध शुक्र अपने चंद्रमा सहित पृथ्वी मंगल बृहस्पति और शनि वृत्ताकार कक्षाओं में सूर्य के चारों ओर घूमते थे इस मॉडल में भी तारे पृष्ठभूमि में एक गोले पर स्थिर माने गए कोपरनिकस का विश्वास था कि सभी ग्रहों का आकार एक समान था, ग्रहों की गति को समझने में यह मॉडल टॉलमी के मॉडल जितना ही कारगर साबित हुआ, इस मॉडल का टकराव भू केंद्रित मॉडल से हुआ और यह तब तक सार्वजनिक रूप से नहीं स्वीकारा गया जब तक Galileo तथा कैपलर के कार्य ने इसे सही प्रमाणित नहीं कर दिया|

कोपरनिकस का सूर्य केंद्रित मॉडल गैलीलियो Galileo के खगोलीय एक्सपेरिमेंट द्वारा प्रमाणित हुआ| सन 1609 में गैलीलियो ने अपने स्वनिर्मित छोटे व अपूर्ण दूरबीन का रुख आकाश की ओर किया उनके एक्सपेरिमेंट द्वारा ब्रह्मांड के विषय में हमारे ज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन आए| चंद रातों में किए गए एक्सपेरिमेंट से Galileo को इतनी जानकारी मिली कि उससे शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित विश्व की प्राचीन तस्वीर छिन्न भिन्न हुई जैसे कि चंद्रमा एक संपूर्ण और चिकना गोरा होने की वजह समतल तथा पहाड़ियों और घाटियों से युक्त पाया गया|
शनि ग्रह तीन भागों में बटा हुआ दिखाई पड़ा उन्होंने चार चंद्रमा को बृहस्पति ग्रह के चारों ओर घूमते हुए भी मानव आकाश में को पंकज के मॉडल का एक छोटा नमूना विद्यमान हो|

ब्रह्मांड के सूर्य केंद्रित मॉडल का उस समय विरोध होने के बावजूद यह परीक्षण आखिरकार स्वीकार कर लिए गए जिसके कारण भूख केंद्रीय मॉडल अस्वीकृत कर दिया गया पर इस संबंध में एक दिलचस्प बात यह है कि आज भी हमारे आम जीवन में विकेंद्रित धारणाएं जो कि क्यों बनी हुई है Aristocrats
के लगभग 2200 वर्षों और गैलीलियो के लगभग 400 वर्षों बाद भी हमें आमतौर पर यही लगता है कि जैसे पृथ्वी घूमती नहीं है उदाहरण के लिए आज भी हम सूर्योदय और सूर्यास्त की बात करते हैं|


चलिए अब हम देखते हैं ग्रहों की गति के संबंध में कैपलर के नियम क्या कहते हैं?

गैलीलियो के प्रशिक्षण के साथ साथ सूर्य केंद्रीय मॉडल को लगभग उसी समय किए गए योहान कैपलर के कार्य से भी मान्यता मिली| कैपलर जर्मनी के खगोल शास्त्री थे, जिन्होंने ग्रहों की गति के सभी प्रशिक्षुओं को समझा सकने वाले एक मॉडल को बनाने की कोशिश की उस समय पृथ्वी से दिखने वाले ग्रहों की स्थितियों के सबसे सही प्रशिक्षण टाइको ब्राहै ने किए थे|

टाइको ने कैपलर को अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया उन्होंने कैपलेट से मंगल ग्रह का अध्ययन करने को कहा क्योंकि इसकी गति बहुत अनियमित लगती थी और अभी तक के किसी मॉडल द्वारा उसे नहीं समझा जा सका था| दूसरी बात यह थी कि कोपरनिकस के मॉडल के अनुसार ग्रहों की गति हर समय समान रहनी चाहिए किंतु केपलर ने पाया कि ग्रहों की गति सूर्य से उनकी दूरी के अनुसार बदलती है| कई वर्षो की मेहनत के बाद उन्होंने पाया कि मंगल ग्रह की गति को सिर्फ तभी एकदम सही तरीके से समझा जा सकता था| जब यह माना जाए कि वह दीर्घ वृत्ताकार कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमता था और सूर्य उसके केंद्रों में से एक था| इस प्रकार वृत्ताकार कक्षा का विचार त्याग दिया गया अंततः कैपलर ब्राहे के तमाम प्रशिक्षण की ग्रहों की गति के तीन सरल नियमों द्वारा अभिव्यक्त करने में सफल हुए|


इस प्रकार कैपलर की नियमों द्वारा सूर्य केंद्रित मॉडल पर लगे इस मुख्य आरोप का खंडन हुआ कि यह मॉडल ग्रहों के प्रेक्षित मार्ग की सही सही व्याख्या नहीं कर सकता| इन नियमों ने पाइथागोरस और प्लेटो के इस दृष्टिकोण को भी नकारा, जिसके अनुसार ब्रह्मांड में केवल वृत्ताकार गति ही संभव है और जिसे बाद में कोपरनिकस ने भी बनाए रखा था 70 मी सदी के अंत तक ब्रह्मांड का सूर्य केंद्रित मॉडल सामान्य रूप से स्वीकार कर लिया गया| यह बात काफी दिलचस्प है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमने का प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय मिला जब उसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी क्योंकि तब तक प्राय सभी लोग यह बात मान चुके थे|

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